क्या आपके आसपास भी ऐसा कोई व्यक्ति मौजूद है, जो हर गलती या बुरी घटना का ठीकरा अपने सिर पर ही फोड़ने लगता है? निश्चित ही, कोई एक नहीं, कई लोग होंगे। मानव प्रवृत्ति ही ऐसी है कि कुछ बुरा घटित होने पर हम स्वयं को ही उसका दोषी मानने लगते हैं।
मनोवैज्ञानिक और मनोविश्लेषक रोजाना न जाने ऐसे कितने ही लोगों से रू-ब-रू होते हैं, जो अपने बचपन की कड़वी यादों और पीड़ा को लादे हुए उनके पास चले आते हैं। बचपन के ये कड़वे अनुभव बड़े होने पर अवसाद और तनाव में बदल जाते हैं। वैसे, बड़े होने पर हम किस तरह के इनसान बनेंगे, यह बहुत हद तक हमारे बचपन पर निर्भर करता भी है। दरअसल, जब बचपन में किसी बच्चे की भावनात्मक जरूरतें पूरी नहीं हो पातीं या उसे प्यार नहीं मिलता, तो बड़ा होने पर वह एक रूखे और अकेले इनसान में तब्दील होने लगता है।
उसे महसूस होने लगता है कि उसके जीवन में घटने वाली हर बुरी घटना का जिम्मेदार वह खुद है, क्योंकि यदि ऐसा नहीं होता, तो उसका बचपन भी बाकी बच्चों की तरह खुशनुमा और प्यार भरा होता।
दूसरों को खुश करने की चाह
हमें छुटपन से ही सिखाया जाता है कि बड़ों की बात मानना अच्छे होने की निशानी है और जिद करना खराब बात है। लेकिन, हम भूलने लगते हैं कि हमारा अपना भी कोई अस्तित्व, पसंद-नापसंद है। फिर, हमारा बस एक उद्देश्य रह जाता है कि दूसरों को कैसे खुश रखा जाए। और इस प्रयास में हम अपनी इच्छाओं को कुचलने लगते हैं। नतीजा, खुश रहने की बजाय हमारा अंतर्मन खाली होने लगता है। जब लंबे समय तक यही स्थिति बनी रहती है, तो हम स्वयं से ही कटने लगते हैं। यह भूल जाते हैं कि दूसरों से पहले स्वयं की संतुष्टि जरूरी है।
अच्छा भी मैं और बुरा भी मैं
जब कोई व्यक्ति अपने आप को पीछे रखकर दूसरों की खुशी को प्राथमिकता देने लगता है, तो धीरे-धीरे उसका मन और व्यक्तित्व दो भागों में बंट जाते हैं। एक भाग वह, जो दूसरों के सामने उनके कानों सुहाती बातें करता है और व्यक्तित्व का एक हिस्सा वह, जो जानता है कि ऐसा करने पर उसे खुशी नहीं मिल रही। पर, दूसरों की नाराजगी के डर से वह खुद को कभी जाहिर नहीं कर पाता। इस स्थिति में फंसा हुआ व्यक्ति वास्तव में बहुत विकट दुविधा का सामना कर रहा होता है, क्योंकि उसके अंतर्मन के अच्छे और बुरे भाग में चल रहा द्वंद्व मानसिक शांति को भंग करने लगता है।
नतीजा, अकेलापन, आत्मविश्वास की कमी और स्वयं को किसी काबिल न समझने जैसे भाव मन में घर करने लगते हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या दूसरों की खुशी के लिए स्वयं को मारना जरूरी है? क्या हर गलती के लिए खुद को दोषी मानना जायज है? क्या अपनी बात या अपने विचार दूसरों के सामने रखना विद्रोह कहलाता है? और यदि इन सब प्रश्नों का उत्तर ना में है, तो ऐसा क्या किया जाए कि हम इस मनोस्थिति से बाहर निकल सकें?
रखें अपना पक्ष
कभी ना बोलनेे वाला व्यक्ति जब मजबूती से अपनी बात रखता है, तो जितना मुश्किल सामने वाले के लिए यह हजम करना होता है, उतना कठिन उस शख्स के लिए अपनी बात रखना भी होता है। असल में, वह नहीं जानता कि हमेशा दूसरों की हां में हां मिलाने की उसकी आदत को पसंद करने वाले लोग कहीं उसे विद्रोही तो समझने नहीं लगेंगे! पर, यदि एक बार आपने अपनी बात मजबूती से रखने का हौसला कर लिया तो यकीन मानिए, आपके मन को मजबूती तो मिलेगी ही, अपने वजूद के होने का जो एहसास होगा, वह अतुलनीय होगा। फिर आप हर गलती का जिम्मेदार खुद को ठहराना बंद कर देंगे।
खुद पर करें विश्वास
लंबे समय से परेशान व्यक्ति धीरे-धीरे खुद पर से ही विश्वास खोने लगता है, क्योंकि कभी-कभी संकट की घड़ी इतनी लंबी लगने लगती है कि व्यक्ति अपना हौसला खोने लगता है। दूसरों की राय पर चलना उसकी मजबूरी बन जाती है। लेकिन, खुद पर विश्वास मजबूत हो, तो स्थिति को संभाला जा सकता है। याद रखिए, हमारा स्वयं पर विश्वास ही हमारी वास्तविकता का निर्माण करता है। यानी, हमारा आत्मविश्वास और दृढ़ इच्छा शक्ति हमारे सपनों को मूर्त रूप देने का कार्य करती है। किसी भी स्थिति में स्वयं पर से विश्वास को डिगने न दें।
आप गैर-जरूरी नहीं हैं
हमेशा दूसरों का खयाल रखने वाले लोग अकसर अपने आप को नजरअंदाज करने लगते हैं। ‘दूसरों की खुशी में ही मेरी खुशी है’, यह सुनने में अच्छा लगता है, पर इस बात को अपने असल जीवन में उतार लेने का काफी विपरीत प्रभाव पड़ता है। ऐसा करने से आपकी मानसिक शांति तो भंग होती ही है, बाकी लोगों की अपेक्षाएं भी बढ़ती जाती हैं। इसलिए, खुद को महत्वपूर्ण समझने से न हिचकें और न ही कभी अपनी जरूरतों को नजरअंदाज करें। जब आप स्वयं को जरूरी समझेंगे, तभी अपना खयाल रख पाएंगे और खुश भी रह पाएंगे।
जैसे हैं, वैसे रहें
जीवन की कड़वी सच्चाई है कि आप सबको संतुष्ट नहीं कर सकते। हो सकता है कि आपकी कोई खूबी किसी को अवगुण लगती हो या आपकी कोई खराब आदत किसी को बहुत भाती हो। जैसे, यदि कोई बेहद लंबा है, तो भी उस पर तंज कसा जाता है और कोई नाटे कद का है, तो लोग उसका भी मजाक बनाते हैं। हालांकि, यह बिलकुल गैरजरूरी बात है, पर फिर भी अकसर हम दूसरों के प्रति अपनी राय से बहुत ज्यादा प्रभावित हो जाते हैं। इन बातों सेे परेशान होने की बजाए बेहतर यह है कि जैसे हैं, वैसे ही रहें। किसी को खुश करने के लिए स्वयं को ना बदलें।
Sudipta Dash, Runner-Up at Mrs India 2025: A Crown Forged by Discipline, Grace, and Purpose…
DON’T ANNOUNCE YOUR DREAMS. PROVE THEM. Tia Sing at 52: Glamour, Grit, and a Back-to-Basics…
Life After 40: How Sreejata Mukherjee Is Redefining Strength, Aging, and Intentional Living By Sreejata…
From 75 kg to Stage Lights: The Glamorous Rise of Nabarupa Mukherjee A Life Once…
Ozempic and the New Science of Weight Loss: Why It Works, Who It’s For, and…
From Postpartum to Peak Form: How Simran Kaur Redefined Strength, Science, and Self-Belief After Motherhood…