एमबीए पति और सीए पत्नी का खेती से लगाव: खेती के बाद नर्सरी में भी मिली कामयाबी

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राजस्थान के जोधपुर के ललित देवड़ा और उनकी पत्नी खुशबू देवड़ा ऐसी सब्जियों की खेती करते हैं, जिनकी कल्पना कम पानी के मरुस्थलीय क्षेत्रों में पहले कभी नहीं की जा सकती थी। अब पश्चिमी राजस्थान की पहली हाइटेक नर्सरी का संचालन कर रहे हैं और अगला कदम एग्रो टूरिज्म की तरफ बढ़ा रहे हैं।

एमबीए जैसी डिग्री के बाद ज्यादातर लोग बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों में जाना चाहते हैं, लेकिन ललित देवड़ा ने एमबीए करने के बाद खेती की ओर वापस लौट आए और अब दूसरे युवाओं के लिए प्रेरणा बन रहे हैं। ललित ने मेहनत और लगन के बूते विपरित परिस्थितियों में ऐसी सब्जियां व फसल उगाई, जिनकी कल्पना कम पानी के मरुस्थलीय क्षेत्रों में पहले कभी नहीं की जा सकती थी। अब पश्चिमी राजस्थान की पहली हाइटेक नर्सरी का संचालन कर रहे हैं और अगला कदम एग्रो टूरिज्म की तरफ बढ़ा रहे हैं। इसमें उनका साथ दे रहीं हैं उनकी पत्नी खुशबू देवड़ा, जो सीए हैं लेकिन अब इनका भी मन पूरी तरह खेतों में रम गया है। पॉलीहाउस में जिला प्रशासन ने सम्मानित किया तो कृषि विवि ने बेस्ट नर्सरी का अवार्ड किया। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी कार्य की सराहना कर चुकी है। एक प्रगतिशील किसान के नाते कृषि विश्ववविद्यालय जोधपुर ने इन्हें अपनी प्रबंध कमेटी में बतौर सदस्य शामिल किया है।

खेती की तरफ ऐसे बढ़ा रुझान जोधपुर से करीब 12 किलोमीटर दूर सुरपुरा बांध के पास रहने वाले 33 वर्षीय युवा ललित देवड़ा के इस सफर की शुरूआत हुई वर्ष 2012 में। महाराष्ट्र के पुणे से एमबीए पूरा किया और टॉप-10 स्टूडेंट में शामिल रहे। अंतिम वर्ष के दौरान जब इंटर्नशिप कर रहे थे तब तक तो खेती से कोई लेना देना ही नहीं था।

ललित बताते हैं, “इन्टर्नशिप के लिए हर दिन 32 से 33 किलोमीटर की दूरी तय कर बाइक से वाघोली कस्बे तक जना होता था। रास्ते में मेरी नजर बड़े-बड़े ग्रीन हाउस और पॉलीहाउस की तरफ पड़ी क्योंकि राजस्थान में तो कभी हमने इसे देखा ही नहीं था। इसलिए शुरू में समझा कि यहां कोई बड़ा आयोजन हो रहा है, उसके लिए टेंट लग रहे हैं।”
“एक.. दो… तीन… दस और फिर एक माह तक उन्हें देखा तो समझने का प्रयास किया। तब पता लगा कि ये ग्रीन और पॉलीहाउस है। धीरे-धीरे प्लांटों से जुड़ाव होने लगा। सब्जियों, पौधों को देखता, उनकी प्रकृति समझता और थोड़ा समय बिताने लगा, “ललित ने बताया। बस यहीं से ललित का खेती की तरफ रुझान बढ़ा, इन्टर्नशिप पूरी हुई तो बतौर आईसीआईसीआई सिक्यूरिटी रिलेशनशिप मैनेजर आठ लाख के पैकेज में जॉब ऑफर हुई, लेकिन ठुकरा दिया। क्योंकि मन का जुड़ाव अब प्रकृति से हो चुका था और यहां से राह पकड़ी अपनी माटी की तरफ…। फिर दो कम्पनियों के ऑफर लेटर भी आए लेकिन अब दिल व दिमाग, दोनों ही खेतों की तरफ मुड़ चले।

ऐसे हुई सफर की शुरुआत

ललित जोधपुर आने से पहले एक मर्तबा गुजरात भी गए। ललित बताते हैं, “गुजरात जाकर देखा तो कि मेट्रो सिटी में बड़ी-बड़ी कम्पनियां सब्जियों के उत्पादन से लाखों रुपए कमा रही हैं, उनके पास बहुत ज्यादा जमीन भी नहीं है। एक से दो बीघा जमीन पर आधुनिक तरीके से उद्यानिकी फसलों व संरक्षित खेती के माध्यम से यह काम किया जा सकता है। बस यहीं से ठान लिया कि खेती ही करेंगे।” साल 2013 में मार्केटिंग व फाइनेंस में एमबीए के बाद घर लौटे तो अभिभावकों के चेहरों पर खुशी थी कि बेटा अब अच्छी नौकरी करेगा, लेकिन ललित ने जब खेती की इच्छा जताई तो परिजनों को झटका लगा। परिचितों ने भी ताने मारने में कसर नहीं रखी। अपनी पुश्तैनी जमीन से ही शुरुआत करने का फैसला किया। ललित के पुश्तैनी खेत में परम्परागत फसल होती थी, लेकिन पानी के अभाव में उसमें भी फायदा ना के बराबर ही था। पिता ब्रहमसिंह से पारिवारिक 12 बीघा में से केवल 400 वर्ग मीटर जमीन मांगी।
प्रशिक्षण लिया तो बदल गया नजरिया

ललित ने खेती का मन तो बना लिया, लेकिन अब प्रश्न यह था कि करेंगे कैसे? ललित कहते हैं, “जोधपुर आकर उद्यान विभाग से सम्पर्क किया। पॉलीहाउस और ग्रीन हाउस के बारे में समझा। परिजनों व परिचितों से चर्चा की तो डराया गया कि यहां ये सक्सेज नहीं है। साल 2008 में इनकी शुरुआत जोधपुर में हुई थी, लेकिन फ्लॉप हो गया क्योंकि यहां का क्लाइमेट इसके अनुकूल नहीं है। लेकिन मैंने जो सोचा, उसे पूरा करने की ठान ही ली थी। कृषि अधिकारियों के कहने पर जयपुर प्रशिक्षण के लिए गया। वहां कृषि अनुसंधान केन्द्र में उद्यान विभाग के अधिकारियों से करीब एक माह तक कृषि और उद्यानिकी की बारीकियां सीखी।”

प्रशिक्षण के दौरान तो इस फील्ड के लिए नजरिया ही चेंज हो गया। वहां कई प्रोफेसर मिले। उन्होंने प्लांट के संबंध में ललित का बेसिक क्लीयर किए। प्लांट कैसे ग्रो होते हैं, क्या रोग लगते हैं, रोगों से कैसे बचाते हैं। कुल मिलाकर प्लांट की पूरी साइंस वहां समझ आ गई। वो समझ गए कि प्लांट की डिमांड इंसानों की तरह ही है, उन्हें उसी तरह समझना पड़ेगा। कामयाबी मिली तो बढ़े साथ देने वाले ललित देवड़ा ने सबसे पहले अपने फॉर्म पर शेडनेट हाउस लगाकर सब्जियां उगाना शुरू किया। धीरे धीरे पॉलीहाउस भी लगाया। उद्यान विभाग से अनुदान लेकर खीरे का उत्पादन लेना शुरू किया। कृषि अधिकारियों के निरंतर सम्पर्क में रहने लगे। खीरे के लिए टर्की से बीज मंगवाए। वर्ष 2015-16 में आधा बीघा जमीन पर कुल 28 टन खीरा ककड़ी का उत्पादन हुआ। चार लाख रुपए की लागत आई और पहली बार की खेती में ही 12 से 13 लाख रुपए का शुद्ध मुनाफा हुआ।
खेती में सब्जियों के उत्पादन पर जोर रखा। अपने खेत पर ग्रीन हाउस बनवाया। बूंद-बूंद सिंचाई सिस्टम लगवाया। ककड़ी के बाद लाल, पीली व हरी शिमला मिर्च, टमाटर आदि उगाने शुरू किए। दिन प्रतिदिन खेती बाड़ी में मुनाफा बढ़ता गया तो ताने मारने वाले भी साथ देते नजर आए। ललित अब पपीता, अनार और स्ट्राबेरी की खेती भी कर रहे हैं। पूरे फॉर्म पर बूंद-बूंद सिंचाई संयत्र लगाया। इनका फॉर्म समन्वित कृषि प्रबंधन का उदाहरण है। केंचुआ यूनिट भी लगाई गई है। कृषि अभियांत्रिकीय के लिए भी यूनिट हैं, जहां छोटे-बड़े उपकरण भी बनाए जाते हैं। खेती में बढ़ते रसायनों के उपयोग को कम करने के लिए जैविक खेती को बढ़ावा दिया जाने लगा है।
खोली नर्सरी, टर्न ओवर एक करोड़ पार सब्जियों व फलों के बाद ललित ने बागवानी पर ध्यान देना शुरू किया। फॉर्म हाउस पर वर्ष 2018 में स्वास्तिक नाम से नर्सरी की शुरूआत की है। फिलहाल विभिन्न प्रजातियों के 500 पौधे यहां उपलब्ध है। पश्चिमी राजस्थान में अत्याधुनिक नर्सरियों में इसका नाम है। इंडोर के साथ ही आउटडोर पौधे भी यहां हैं। पिछले साल एक करोड़ का टर्न ओवर हुआ।

ललित बताते हैं, “जहां तक बात नर्सरी की है तो शुरूआत में टर्न ओवर 23 से 30 लाख रुपए था। फिर हम 60 से 80 लाख तक पहुंचे और अब एक करोड़ के पार है। असल में हम प्लांट के नेचर के बारे में हमारे कस्टमर को पूरा अपडेट करते हैं। कस्टमर को प्लांट ही नहीं बेचना है, उसे एजुकेट करने का काम भी हमारा ही है। कितना पानी देना है, कब पानी दे, रोग क्या लग सकते हैं, कौन सी खाद देनी है, पौधे का कितनी धूप चाहिए, इसे कहां रखें? इस तरह के कई सवालों के जवाब हम देते हैं।” ललित के अऩुसार उसके फॉर्म हाउस में 15 से 20 का स्टॉफ है, उन्हें रोजगार प्रदान किया। यह सबसे बड़ा सुकून है कि वो आज रोजगार मुहैया करवाने वाले बन गए। मिल रहे हैं कई बड़े प्रोजेक्ट पश्चिमी राजस्थान का क्लाइमेट नर्सरी व खेती के लिए सही नहीं था, लेकिन ललित ने आधा एकड़ में 28 टन खीरे की फसल लेकर रिकॉर्ड बनाया। जोधपुर के करवड़ स्थित आईआईटी परिसर में बागवानी का काम टाटा कम्पनी के एक प्रोजेक्ट के जरिए मिला था। आईआईटी परिसर में न पर्याप्त पानी था और ना ही अच्छी मिट्टी, वैसे भी इस क्षेत्र में पानी का संकट है।

ललित बताते हैं, “मैंने नवाचार किए। बूंद बूंद सिंचाई पद्धति से पौधे व घास विकसित की। तकनीक व मेरे स्टॉफ की मेहनत से पूरा एरिया हरियाली से भर गया। यह करीब एक करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट था। मेरे से पहले तीन-चार कम्पनियों ने काम की कोशिश की थी, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल पाई। कई हैण्डीक्राफ्ट फैक्ट्रियों में भी ग्रीनरी को लेकर काम किए हैं और यह सिलसिला जारी है।” पत्नी का भी मिला पूरा साथ ललित की शादी पाली शहर की खुशबू देवड़ा से हुई। पत्नी सीए हैं। शादी के बाद पत्नी भी खेतीबाड़ी में पूरा साथ दे रही है। फॉर्म हाउस और नर्सरी से लेकर अन्य खाते खुशबू के जिम्मे हैं तो रिटेलर का काम भी वही देखती है जबकि ललित बाहर के लोगों से सम्पर्क और अन्य कार्य करते हैं। फॉर्म पर नर्सरी का सेटअप भी खुशबू देखती है।

खुशबू देवड़ा भी पति का पूरा साथ देती हैं। खुशबू देवड़ा बताती हैं, “मेरे पति का काम आगे बढ़ा, मैं भी पूरी तरह साथ देने लगी। सभी लेखा मैं ही देखती हूं। साथ ही नर्सरी के काम का रिटेलिंग मैं देखती हूं तो बाहर का काम ललित। घर के साथ ही दोहरी जिम्मेदारियां महिलाएं आराम से संभाल सकती हैं। मन में चाह और लगन होनी चाहिए। कहते हैं ना कि एक सफल आदमी के पीछे औरत का ही हाथ होता है। मैं मानती हूं कि यह सोच है और इसी सोच के साथ हम दोनों बढ़ रहे हैं।” 9 लाख के मुनाफे से एक करोड़ का टर्न ओवर इस तरह हासिल सबसे पहले ललित ने खीरे की फसल ली। हॉफ एकड़ में 28 टन खीरा उत्पादन हुआ। जिसे जोधपुर मंडी में बेचा गया। इस पर करीब चार लाख रुपए की लागत आई थी, लेकिन मुनाफा 9 लाख रुपए हुआ। दो साल तक यह क्रम अनवरत चलता रहा। मुनाफा थोड़ा बहुत ऊपर नीचे रहा।

दो साल बाद बेलदार टमाटर लगाए। इसमें तीन लाख रुपए का खर्चा आया और मुनाफा 50 प्रतिशत रहा। यानी आठ से नौ लाख रुपए प्राप्त कर लिए। वर्ष 2018-19 में टर्न ओवर 35 लाख तक पहुंचा, इसमें 40 प्रतिशत का मुनाफा कमाया। धीरे धीरे 60 से 65 लाख का टर्न ओवर किया, उसमें मुनाफा 25 प्रतिशत रहा क्योंकि वापस इसी में इनवेस्ट करते गए। अभी विभिन्न क्रॉप के अलावा नर्सरी का टर्न ओवर एक करोड़ रुपए है। इसका कारण है कई सरकारी प्रोजेक्ट मिलना। वर्ष 2020 में जोधपुर आइआइटी कैम्पस को हरा-भरा बनाने का कार्य मिला, जो करीब 83 लाख रुपए का था। इसके अलावा देश के कई इलाकों से नर्सरी के पौधे भी यहां से ले जाते हैं। लोकल नर्सरी संचालक भी पौधे ले जाते हैं। साथ ही गमले भी रखते हैं। मिट्टी, चीनी मिट्टी के अलावा प्लास्टिक के गमले भी इनकी नर्सरी पर है।गेंदे के फूल के बीज कोलकत्ता से मंगवाकर यहां लगवाए, इसे खुले में लगाया गया, जिस पर भी 50 हजार रुपए का मुनाफा होता है। खेत में वर्मी कम्पोस्ट प्लांट लगाया है, करीब एक लाख रुपए की खाद बेच देते हैं। खुद भी जैविक खाद तैयार करते हैं|

 

Sushmita

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